Saturday, 29 July 2017

राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह)

राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह)

राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) (राज 1509-1527) उदयपुर में शिशोदिया राजवंश के राजा थे।
राणा सान्गा का पुरा नाम महाराणा सग्रामसिन्ग था।
राणा सान्गा ने मेवाड मे १५०९ से १५२७तक शासन किया,
जो आज भारत के राजस्थान प्रदेश के रेगिस्थान मे स्थित है।
राणा सान्गा सिसोदिआ(सुर्यवन्शी राजपुत) राजवन्शी थे।
राणा सान्गा ने विदेशी आक्रमणकारियो के विरुध सभी राज्पुतो को एकजुट किया।
राणा सान्गा सही मायनो मे एक बहादुर योद्धा व शासक थे, और जो अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिध्द हुये।
एक विश्वासघाती के कारण वह बाबर से युध्द हारे लेकिन अपनी शौर्यता से दूसरो को प्रेरित कीया।

राणा रायमल के बाद सन १५०९ राणा सान्गा मेवाड के उत्तरधिकारी बने।
इन्होने दिल्ली, गुजरात,व मालवा मुगल बादशाहो के आक्रमणो से अपने राज्य कि बहादुरी से ऱक्षा की।
उस समय के वह सबसे शक्तीशाली हिन्दू राजा थे।

इनके शासनकाल मे मेवाड अपनी समृद्धि कि सर्वोच्च ऊचाई पर था।
एक आदर्श राजा की तरह इन्होने अपने राज्य की ‍रक्षा तथा उन्नति की।
राणा सांगा अदम्य साहसी (indomitable spirit) थे एक भुजा,एक आँख खोने व अनगिनत जख्मो के बावजूद भी उन्होंने अपना महान पराक्रम नही खोया,
सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युध्द मे हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हे उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया, यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है।

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Sunday, 19 February 2017

राजपूत क्षत्रिय

राजपूत क्षत्रिय 


1. Rana
2. Raja
3. Raol
4. Rao
5. Maharao
6. Raulji
7. Maharaulji 

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वैसे तो आदि कल से क्षत्रियो में सिर्फ राजकुमार और राजाओ की ही उपाधिया(ख़िताब) दिये जाते थे पर ब्रिटिश सरकार के आगमन के बाद क्षत्रियो को राजपूत बनाकर अलग अलग टाइटल्स व् ख़िताब व् उपाधिया दी गई जिस से कई बड़े बड़े क्षत्रिय वंश का बटवारे हो कर सिमट गये और काफी नए राजवंश बनकर उभर आये वैसे में कुछ ही राजवंश थे जिन्होंने अपने स्वाभिमान के खातिर ब्रिटिश सरकार की उपाधिया धारण नही की थी मिली जरूर थी उनको राजस्थान, गुजरात, सौराष्ट्र, मध्यप्रदेश, बिहार, दक्षिण भारत तक के राजपूतो की रियासतों में ब्रिटीश सरकार ने उनके अपने राज्यमें वीरता,रक्षण,कुशल राजनीती,धर्म, व् शिक्षण के हेतु दिये थे मगर ज्यादातर उन गोरो की उन खिताबो के पीछे कुटिल राजनीती ही थी के अगर किसी बड़ राजवंश की रियासत के ठाकुरो के बिच राज करना है तो किसी एक को अलग ख़िताब देकर उस रियासत को अलग कर देते थे देखने में तो गोरो कि ये नीति बड़े बड़े ठाकुरो के लिए अछि थी मगर आम राजपूत के लिए तो ये बटवारा ही था.

1. राणा

वैसे तो ये उपाधि क्षत्रिय श्रेष्ठ कुलभूषण महाराणा प्रताप के समय से ही दी जाती थी जैसे उनके सेनापति जाला_मान को सर्व प्रथम मिली थी जो राजवंश आज भी सौराष्ट्र में अपनी वीरता की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान करता है. जिनके महा प्रतापी पुरुष हरपालदेवजी जाला हुवे. पर इस राजवंश ने कभी ब्रिटीश सरकार के ख़िताब को अपने राणा ख़िताब को नही अपनाया जो उनके क्षात्र धर्म के प्रति अपनी अलग पहचान थी.
P.S:- राणा आपके नाम के आगे कब लिख जा सकता है जब आपके दादोसा हुकम का निधन होवा हो और आपके पिता श्री हुकम ठाकुर की गादी पर बिराजमान ही और आपको की छोटी सी जागीर का जागीरदार बनाया जाये तब

2. राजा

कोई बड़े रियासते से अलग होकर जिस ठाकुर को राज मिलते थे उन्हें राजा की उपाधि से समानित किया जाता था और उनके आगे राजा लिखा जाता था बाद में ऐसे कई ठिकानो पर ये खिताबे दिये जाने लगे और ऐसे राजा की उपाधि मिलने लगी थी

3. राओल

अंग्रेजो के समय में सबसे ज्यादा दिये जाने वाले खिताबो में ये सबसे अधिक महत्व पूर्ण था जो काफी अधिक समय तक चला था जिसे ये ख़िताब सबसे पहले भावनगर रियासत के मितली व्  वरसाना ठिकाने के गोहिल राजपूतो के सबसे पहले ये राओल (Raol) का ख़िताब मिला था बाद में गुजरात में माणसा ठिकाने चावड़ा राजवंश के ठाकुर साहब को ये उपाधि दी गई थी जे के बाद उनकी फॅमिली राओल स्वर चावड़ा लिखती गई.पर इस सब के बाद आखिर में राजपूत को अपने सम्मान के लिए अपने ही वंश के आगे और कोई सम्मान नही चाहिये.

4. राव

जिस जागीरदारी के जागीरदार को आपने जागीरी को जित कर अंग्रेज सरकार को टैक्स के रूप में उसी जमीन से जो रकम ज्यादा भेजा करते थे उन्हें वो अंग्रेज राव की उपाधि दे थे जो उनके नाम के आगे लिखा जा सकता था जो कई राजा के नाम के आगे
अपनी पेढ़ी के वारिशों तक चली आये है.

5.  महाराव

जैसे राव की उपाधि थी वैसे ही उनके ऊपर के बड़े ठाकुरो को ये उपाधि थी दी जाती थी महाराव पर उनको सिर्फ उस राज्य के ठाकुर साहब के आगे ही महाराव लिखा सकते थे.

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Tuesday, 24 March 2015

सभी राजपूत वंश और उनकी कुल देवियां।।

सभी राजपूत वंश और उनकी कुल देवियां।।

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1.राठौड़ :- नागणेचिया माता

2.गहलोत :- बाण/बायण/ब्राह्मणी/बाणेश्वरी माता

3.कछवाहा :- जमवाय माता

4.दहिया :- कैवाय माता

5.गोहिल :- चामुंडा माता (सहायक खोडियार माता)

6.चौहान :- आशापूर्णा माता
7.बुन्देला :- अन्नपूर्णा माता
8.भारदाज :- शारदा माता
9.चंदेल :- मेंनिया माता
10.नेवतनी :- अम्बिका भवानी माता
11.निमुडी:- प्रभावती माता
12.चुड़ासमा :- खोड़ियार माता
13.बड़गूजर :- कालिका(महालक्ष्मी)माँ
14.निकुम्भ :- कालिका माता
15.स्वाति :- कालिका माता
16.उदमतिया :- कालिका माता
17.उज्जेनिया :- कालिका माता
18.दोगाई :- कालिका(सोखा)माता
19.धाकर :- कालिका माता
20. गर्गवंश :- कालिका माता
21.परमार :- सच्चियाय माता
22.पड़िहार :- गाजण माता (केरला,चोटिला)
23.सोलंकी :- खीवज माता
24.इन्दा :- चामुण्डा माता
25.जेठंवा "- चामुण्डा माता
26.चावड़ा :- चामुण्डा माता
27.गोतम :- चामुण्डा माता
28.यादव :- योगेश्वरी माता
29.कौशिक :' योगेश्वरी माता
30.परिहार :- योगेश्वरी माता
31.बिलादरिया :- योगेश्वरी माता :
32.तंवर :- चिलाय माता
33.हैध्य :- विन्ध्यवासिनि माता
34.कलचूरी :- विन्धावासिनि माता
35.सेंगर :- विन्धावासिनि माता
36.भॉसले :' जगदम्बा माता
37.दाहिमा :- दधिमति माता
38.रावत :- चण्डी माता
39.लोह थम्ब :- चण्डी माता
40.काकतिय :' चण्डी माता
41.लोहतमी :- चण्डी माता
42.कणड़वार :' चण्डी माता
43.केलवाडा :- नंदी माता
44.हुल :- बाण माता
45.बनाफर :- शारदा माता
46.झाला :- शक्ति माता
47.सोमवंश :- महालक्ष्मी माता
48.जाडेजा :- आशपुरा माता
49.वाघेला :- अम्बाजी माता
50.सिंघेल :- पंखनी माता
51.निशान :- भगवती दुर्गा माता
52.बैस :- कालका माता
53.गोंड़ :- महाकाली माता
54.देवल :- सुंधा माता
55.खंगार :- गजानन माता
56.चंद्रवंशी :- गायत्री माता
57.पुरु :- महालक्ष्मी माता
58.जादोन :- कैला देवी (करोली ) माता
59.छोकर :' चन्डी केलावती माता
60.नाग :- विजवासिन माता
61.लोहतमी :-चण्डी माता
62.चंदोसिया :- दुर्गा माता
63.सरनिहा :- दुर्गा माता
64.सीकरवाल :- दुर्गा माता
65.किनवार :- दुर्गा माता
66.दीक्षित :- दुर्गा माता
67.काकन :- दुर्गा माता
68.तिलोर :- दुर्गा माता
69.विसेन :- दुर्गा माता
70.निमीवंश :- दुर्गा माता
71. शेखावत :- जामवाय माता
72. सिसोदिया वशं :- बायण माता
73. भाटी :- सान्गया माता
74.वाघेला:- विजयाशनि माता

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